जयपुर ओर मैं: एक सफर जो सिर्फ सड़क का नहीं, विचारों का था सहारनपुर से तड़के निकली यात्रा और दुनिया की दौड़

 वक़्त हो रहा था सुबह के ठीक 3:00 बजे। सहारनपुर की ठंडक और गहरी खामोशी को चीरते हुए मैंने अपनी गाड़ी का इंजन स्टार्ट किया। मंज़िल थी जयपुर। खुली सड़क थी और मन में था एक अनजाना रोमांच। इस तरह तड़के सुबह ड्राइव करने में एक अजीब सा सुकून मिलता है; यह सफ़र सिर्फ़ सड़क का नहीं, खुद के साथ होने का होता है। दूर भागते रास्तों को देखते हुए जो आनंद मिलता है, वह बयान करना मुश्किल है।

जैसे-जैसे सूरज की रोशनी फैलने लगी, सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ती गई। पानीपत पार करके सोनीपत पहुँचते ही, मेरे चारों ओर सैकड़ों गाड़ियाँ दिखने लगीं। आते-जाते इन वाहनों को देखकर मेरे मन में बस एक ही सवाल आया: “यह दुनिया रुकती क्यों नहीं?”

यह कैसी अंधी दौड़ है जो हर किसी ने पकड़ रखी है? सब भाग रहे हैं—न जाने किस होड़ में, किसको आगे या पीछे छोड़ने की लगी है? इस शोर और रफ़्तार के बीच, मैंने ब्रेकफास्ट के लिए छोटा सा ब्रेक लिया और फिर से इस भागती दुनिया का हिस्सा बन गया।

द्वारका एक्सप्रेस-वे और फिर गुरुग्राम का झटका

सोनीपत के बाद, दिल्ली की भीड़ को बाय-बाय कहने के लिए मैंने द्वारका एक्सप्रेस-वे का नया रास्ता लिया। सच कहूँ तो आनंद आ गया! इस नए रास्ते ने दिल्ली की भीड़ को जैसे काट ही दिया। सफ़र एकदम सहज हो गया।

लेकिन असली झटका लगा हरियाणा में घुसकर, जब मैंने गुरुग्राम (गुड़गांव) क्रॉस किया।

यार! यहाँ की दुनिया एकदम अलग है। गगन चूमती इमारतें ऐसी खड़ी हैं कि लगा मैं भारत देश में नहीं, किसी विदेश में आ गया हूँ। रात यहाँ होती ही नहीं, बस चौबीसों घंटे की रौशनी है। यह सब देखकर मन में एक सवाल उठा: क्या हम अपने गाँव, अपने छोटे शहर में ज़्यादा सुकून से नहीं थे? जहाँ कम से कम लोग एक-दूसरे को जानते-पहचानते तो थे।

यह कैसा शहर है? मुझे लगा जैसे यहाँ के परिंदे भी आपस में बात नहीं करते होंगे! जीवन बस एक भागदौड़ है, जो बसों, ट्रेनों और गाड़ियों में धक्के खाता हुआ चला जा रहा है।

इतिहास का मंथन: जयपुर की गुलाबी गलियाँ

गुड़गांव की चमक-दमक को पीछे छोड़कर मैं राजस्थान की ओर बढ़ा। और अब बदलाव दिखने लगा—मुझे ऊँट दिखाई देने लगे, जो रेगिस्तान की जान और जयपुर की पहली पहचान हैं।

जयपुर पहुँचकर, शहर की गुलाबी पत्थरों से बनी इमारतें एक अलग ही कहानी सुनाती हैं। मैं हवा महल और फिर आमेर (Amber) फोर्ट देखने गया। इतना बड़ा महल! ऊँची-ऊँची दीवारें, मोटे-मोटे दरवाजे—ये सब क्यों बना?

वहाँ घूमते हुए मुझे एक अजीब सा एहसास हुआ। मुझे लगा कि इस देश का भला इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि हमारे पूर्वजों ने मनोरंजन और मौज-मस्ती के लिए इतनी भव्य बिल्डिंगें खड़ी कीं।

आज इन महलों को देखकर मैं सोच रहा था कि वह भी क्या दिन रहे होंगे जब यहाँ रौनक होती थी? और यह विडंबना देखिए, जो राजा के कपड़े उस समय कोई नहीं पहन सकता था, आज बैंड-बाजे वाले उन्हीं कपड़ों को पहनकर अपना काम कर रहे हैं।

यह सड़क यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक की दूरी नहीं थी, यह वर्तमान की भाग-दौड़ से निकलकर इतिहास के भव्य दरवाजों पर दस्तक देने जैसा था। यह सोचना कि ‘मैं’ इस भागती दुनिया में कहाँ हूँ और ‘जयपुर’ का इतिहास मुझे क्या सिखाता है, एक गहरा अनुभव था।

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