लम्बे समय तक साथ रह कर भी अगर किसी दम्पति को चाह कर भी सन्तान पैदा नहीं होती, तो ऐसी स्थिति को ‘बाँझपन’ या सन्तानहीनता ( इन्फर्टिलिटी – Infertility) कहते हैं। ऐसी परिस्थिति में अगर एक बार भी गर्भ नहीं ठहरता तो इसे ‘प्राथमिक बाँझपन ‘ या प्राथमिक सन्तानहीनता (Primary infertility) कहते हैं। यदि एक बार गर्भधारण या सन्तान पैदा होने के पश्चात् यह परिस्थिति हो तो उसे Relative or Secondary infertility कहते हैं।
‘बाँझपन’ या ‘स्टेरीलिटी’ वह स्थिति है जिसमें पति या पत्नी में सन्तान पैदा करने की क्षमता नहीं है या पूर्णतः नष्ट हो चुकी है। पर्याय रूप में इसे ‘Failure to Conceive’ यानि ‘बच्चा नहीं ठहरना’ समझना चाहिये।
→ जब एक दम्पति बच्चे को जन्म देने में असमर्थ हो, तो पुरुष, महिला या दोनों में कोई इसके लिये जिम्मेदार हो सकता है। यह एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में बहुत कम लोग बात करना पसंद करते हैं, क्योंकि समाज में ‘सन्तानहीनता’ या ‘बाँझपन’ को शर्म की निगाह से देखा जाता है और पुरुष के लिये बच्चे पैदा करना मर्दानगी की निशानी समझी जाती है।
‘सन्तानहीनता’ या ‘बाँझपन’ अर्थात् जब आप बच्चे को जन्म देने में असमर्थ हों।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सन्तानहीनता को कुछ इस तरह से परिभाषित किया गया है-
‘किसी दम्पति द्वारा एक वर्ष (यानी 12 मासिक चक्रों) के दौरान सफल शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद गर्भधारण में असफल रहना, सन्तानहीनता की श्रेणी में आता है। आधुनिक चिकित्साशास्त्र में सन्तानहीनता के लिये मुख्यतः दो शब्दों का प्रयोग होता है-बन्धत्व यानी इन्फर्टिलिटी (Infertility) और अनुर्वरण/बन्धत्व का अर्थ है- गर्भधारण में पूर्ण असमर्थता । ऐसा स्त्री जननांगों की पैदायशी विकृति की वजह से होता है।
आजकल गर्भ निरोध के लिये स्त्रियों में जो शल्यकर्म किये जाते हैं, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं। इन कर्मों से उन्हें बिलकुल बन्ध्या (बाँझ) बना दिया जाता है। दूसरा शब्द है “अनुर्वरण” यानी ‘इन्फर्टिलिटी’ । इस अवस्था में महिलाओं के शरीर में गर्भधारण की क्षमता तो होती है, पर कुछ कारणों से या किसी रोग विशेष के कारण वह महिलायें गर्भधारण नहीं कर पातीं, लेकिन जब ऐसी स्त्रियों के रोग का निवारण कर दिया जाता है, तब उनमें गर्भधारण की सामर्थ्य लौट आती है।
हमारे देश में ही ऐसे दम्पतियों की संख्या 16 करोड़ के लगभग है और उनमें हर वर्ष तकरीबन तीन से चार लाख नये दम्पती और जुड़ जाते हैं। सन्तान की चाह में यहाँ लोग खूब परेशान रहते हैं। स्त्रियों का तो और भी बुरा हाल हो जाता है। दरअसल मातृत्व की पीड़ा को स्त्रियों से ज्यादा कौन महसूस कर सकता है। यह पीड़ा उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर कर देती है।
मातृत्व के लिये वह झाड़फूक और तंत्र-मंत्र जैसे उपायों को अपनाने से लेकर नीम-हकीमों के चक्कर में फंसते हैं तथा यहाँ-वहाँ आधुनिक चिकित्सकों के पास पहुँचते हैं तो कभी आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक का सहारा लेते हैं। बावजूद इन सबके सन्तान सुख करोड़ों दम्पतियों के नसीब में नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार पता चला है कि हमारे देश में हर छह जोड़ों में से एक जोड़ा बाँझपन की श्रेणी में आता है अर्थात् हमारे देश में 16 से 20 फीसदी विवाहित जोड़ों में एक जोड़ा ‘सन्तानहीन’ है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विवाहित युग्मों में से लगभग 10% स्वाभाविक रूप से सन्तानोत्पादन में अक्षम होते हैं। दोष दोनों में से किसी में भी हो सकता है,
संक्षेप में-
यदि कोई दम्पति बच्चे की चाहत से 1 वर्ष तक लगातार सम्भोग के बाद भी पत्नी गर्भधारण न कर सके, तो ऐसे दम्पति को बाँझ कहा जाता है।
एक वर्ष का समय इसलिये निर्धारित किया गया है, क्योंकि सामान्यतः 80-90% के लगभग दम्पतियों में 1 वर्ष के अंदर-अंदर गर्भधारण हो जाता है। यदि पति-पत्नी बच्चे की चाहत रखते हों और साथ-साथ रहते हों।
Classification of infertility
1.Primary infertility —
यदि कोई स्त्री जीवन में पहले कभी भी गर्भवती नहीं हुई, उस स्थिति को ‘प्राइमरी इन्फर्टिलिटी’ प्राथमिक बाँझपन कहते है।
2. Secondary infertility —
इस श्रेणी में वे स्त्रियाँ आती हैं, जिनका गर्भाधान पहले कभी हो चुका हो। इनमें कुछ तो ऐसी होती हैं जिनका बाद में गर्भपात हो गया है, पर कुछ ऐसी भी होती हैं जो एक बच्चे को तो सफलतापूर्वक जन्म दे चुकी हैं, परन्तु दूसरे बच्चे के लिये प्रयास करने पर उन्हें असफलता ही मिली हो।
गर्भाधान के प्रमाण उस समय रोगी द्वारा कराये गये परीक्षण जैसे- पेट का अल्ट्रासाउंड (Ultrasound of abdomen of the patient), गर्भाधान के लिये किये जाने वाले अन्य गर्भावस्था परीक्षण (pregnancy test) से मिल जाते हैं। अथवा यदि रोगी ने किसी कारणवश गर्भपात कराया है, तो वह स्वयं बता देता है कि उसका गर्भपात (Abortion) हुआ था।
बाँझपन का कारण-
बाँझपन या सन्तानहीनता की समस्या के लिये पुरुष भी जिम्मेदार है, तब इसके कारणों को भी दो भागों में विभक्त करना होता है।
1. पुरुष सम्बन्धी कारण।
2. स्त्री सम्बन्धी कारण।
इस प्रकार इन पर अलग-अलग विचार करना उचित रहेगा एवं इसका विभाजन इस प्रकार है-
→बाँझपन के लगभग 30-35% रोगी दम्पतियों में पत्नियाँ बाँझपन के लिये पूर्णत: उत्तरदायी होती हैं। एवं
→ बाँझपन के लगभग 30-40% दम्पतियों में पति-पत्नी दोनों ही बाँझपन रोग के लिये उत्तरदायी होते हैं।
अतः बिलकुल स्पष्ट है कि बाँझपन के लिये पति-पत्नी दोनों बराबर के उत्तरदायी होते हैं। अतः जैसे ही किसी दम्पति को बाँझपन का रोग होता है अति शीघ्र उन्हें अपना परीक्षण कराके कारण का पता करना चाहिये।
→ परीक्षण (Test) पति-पत्नी दोनों को एक साथ करवाना चाहिये एवं जैसे ही रोग का निदान हो, अति शीघ्र उसका सम्भव उपचार हो सके ।
उपचार जितनी शीघ्रता से प्रारम्भ किया जाता है उस रोग का पूर्वानुमान (Prognosis) भी उतना ही अच्छा रहता है।
1. पुरुष सम्बन्धी कारण-
→वीर्य में शुक्राणुओं की कमी (Oligospermia)
→वीर्य में शुक्राणुओं की अनुपस्थिति ।
→वीर्य में शुक्राणुओं की अनियमित संरचना।
→ लम्बे समय तक गर्म वातावरण में निवास करना।
→कल कारखानों अथवा भट्टियों के आसपास पुरुष कार्य स्थल होना।
→कृत्रिम वस्त्रों द्वारा बने व कसे हुए अण्डरवियर धारण करना।
→वृषण शिरापस्फीति (Varicocele) नामक विकृति का पाया जाना, जिसमें शुक्राणुकोष में शिराओं का जाल बनने के कारण वहाँ शुक्राणुओं का उत्पादन कम हो जाता है।
→जन्म के पश्चात् वृषण का पेट से अपने स्वाभाविक स्थान स्क्रोटम में न आ पाना।
→रोगी का मधुमेह, गलसुआ (Mumps) अथवा मानसिक तनाव से पीड़ित होना।
→रोगी में विटामिन ई की कमी होना।
→शुक्रवाहिनियों का जन्मजात अभाव होना अथवा इनका विकास न हो पाना।
→काउपर ग्रन्थियों से स्रवण न होना, जिससे मूत्रमार्ग के अम्लीय रह जाने के कारण शुक्राणुओं की मृत्यु हो जाती है।
→पुरुष जननेन्द्रिय अंगों का विकास न हो पाना।
→पुरुष का सिफिलिस, सूजाक (गोनोरिया) अथवा अन्य यौन रोगों से पीड़ित रहना (शुक्राणुनली का संक्रमण-Epididymitis)।
→शुक्राणु नली की सूजन, संक्रमण अथवा क्षयरोग से ग्रसित होना।
→विकिरणों के प्रभाव से अण्डकोषों में विकृति आ जाना।
→वृषण का संक्रमण (Testicular infections)।
→कुपोषण (Malnutrition)
→मूत्रमार्ग का अपूर्ण विकास (Incomplete development of the Urethra)।
→शिश्न के संरचनात्मक विकार (Structural disorders of the penis) |
→कामेच्छा का ह्रास (Loss of libido) |
→नपुंसकता (Impotency)
→शिश्न का ठीक से विकसित न होना (Development defect of penis) ।
→ल्यूटिनाजिंग व फॉलिकुलर स्टूमुलेटिंग हॉर्मोन, जो शुक्राणुओं के विकास में सहायक
है, का होना या कम मात्रा में स्राव होना।
→असामान्य वजन।
→चुस्त पैन्ट या लंगोट पहनना।
→मदिरा या धूम्रपान का अधिक मात्रा में सेवन करना।
→कुछ दवाइयों का अधिक समय तक सेवन करना।
2. स्त्री सम्बन्धी कारण-
1. डिम्बवाहिनी का संक्रमण (Salpingitis)—जैसे –
→ तपेदिक / यक्ष्मा (T.B.)
→ सुजाक (गोनोरिया – Gonorrhoea)
→ क्लैमाइडिया संक्रमण (Clamydia infection)
2. डिम्बवाहिनियों के रचनात्मक विकार (Structural disorder of fallopian tubes)—
→ झल्लरी (Fimbria) का ठीक से विकसित न हो पाना ।
→ डिम्बवाहिनियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाना।
3. डिम्बाशय / ओवरी के विकार (Ovarian disorders)-
→ डिम्बाशय की सूजन (Ovarian swelling) | → डिम्बाशय की पुटी (Ovarian cyst) ।
→ डिम्बाशय के अर्बुद ट्यूमर्स (Ovarian tumors) ।
→ मासिक धर्म का अण्डक्षरण से सम्बन्धित न होना (Anovulatory cycle)।
→ डिम्बाशयों का नष्ट हो जाना (Ovarian atrophy)
→ डिम्बाशयों के विविध विकार।
4. गर्भाशय के विकार (Uterine disorders)—
→ गर्भाशय का अविकसित होना (Hypoplasia of the uterus) गर्भाशय की अनुपस्थिति (Absence of the uterus)
→ गर्भाशय का अत्यधिक छोटा होना।
गर्भाशय में सूजन आ जाना (Inflammation of the uterus) ।
→ गर्भाशय का संक्रमण जैसे-ट्यूबरकुलस एण्डोमेट्राइटिस (Tuberculous endometritis) |
→ गर्भाशय के रचनात्मक विकार (Structural disorders) जैसे-गर्भाशय का दो भागों में विभक्त हो जाना।
गर्भाशय का पश्चवर्तन (Retroversion of the uterus)
→ गर्भाशय के अर्बुद (Tumors of uterus) जैसे- रसौली (Fibroid uterus)
5. गर्भाशय ग्रीवा के विकार (Cervical disorders)—
→गर्भाशय ग्रीवा का मुख अत्यधिक गाढ़ा हो जाना।
→ गर्भाशय ग्रीवा के श्लेष्मा में शुक्राणुरोधी एंटीबॉडी का होना ।
→ गर्भाशय ग्रीवा में पीव भर जाना।
→गर्भाशय ग्रीवा का मुँह बहुत छोटा हो जाना। →गर्भाशय ग्रीवा का संक्रमण (Cervicitis) | →गर्भाशय ग्रीवा के अर्बुद (Cervical tumour)।
6. योनि के विकार (Vaginal disorders) —
→योनिस्राव का अत्यधिक अम्लीय हो जाना। →योनि का संक्रमण। → योनि में पीव भर जाना। → योनिद्वार का बहुत संकरा या बन्द हो जाना। → योनि पर सूजन आ जाना (Vaginitis) |
→ रतिक्रिया के समय अत्यधिक पीड़ा होना। → अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के विकार (Endocrinal disorders)—
8. मधुमेह (Diabetes)—
9. मानसिक तनाव (Mental tension)-
10. जीर्ण रोग (Chronic diseases)—जैसे-
→यक्ष्मा / तपेदिक (Tuberculosis)
→ कैंसर (Cancer)
→ हृदय रोग (Chronic heart disease)
→श्वास रोग (Respiratory disease)
→ रक्त की बहुत कमी (Severe anaemia)
अन्य कारन→
→ डिम्ब का डिम्बाशय से बाहर न निकलना।
→ मासिक धर्म अनियमित होना व न होना।
→ अधिक मोटापा व भारी शरीर होना।
→ महिला का काफी समय तक तनावग्रस्त रहना ।
→ तेजी से शरीर का वजन कम होना, भूख न लगना, खान-पान में कमी या अनियमितता होना ।
→ जन्म से ही शरीर के भीतर किसी कमी का होना।
→डिम्बवाहिनियों व डिम्बाशय के बीच रेशेनुमा स्थिति होना ।
→योनिद्वार का छोटा होना।
→ कभी-कभी स्त्रियों के शरीर में कुछ ऐसे स्राव होने लगते हैं, जिनमें शुक्राणु मर जाते हैं।





